Friday, 8 May 2015

प्राकर्तिक आपदाए इंसान स्वंय बुलाता हे आज का इंसान इतना स्वार्थी और खुदगर्ज हो  उसको नेचर तो क्या अपने नाते रिश्तेदारो और घर वालो तक को भूल गया ,धन और आराम के लिए कुछ भी कर सकता हे नेचुरल भण्डार सिमित हे उनसे दोहन तो थोक भाव से कर रहा हे लेकिन उनको बचाने या सुरक्षित करने के  लिए कोई उपाय नहीं ,
भूजल ,जंगल और तो और पहाड़ो के पहाड़ो तक को चट कर गया  ,प्रकृति कितना सहन करे कोई लिमिट तो होगी लेकिन आज का मानव पावर और धन के कारण सबको बर्बाद कर रहा हे उसको अक्ल आती हे तब तक सब कुछ तबाह हो चुका होता हे इसलिए मेरे प्यारे मानव  प्रकृति को सहेज कर रखे साथ में अपने फर्ज यानि ड्यूटी भी अदा करे 

ई  राम नरेश गुप्ता विवेक विहार सोडाला जयपुर 

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